"हव्वा की बेटियों की दास्तान : दर्दजा" समकालीन हिंदी साहित्य की महत्त्वपूर्ण कथाकार जयश्री राय का एक साहसिक, मार्मिक और विचारोत्तेजक उपन्यास है। यह कृति दुनिया के कई देशों में प्रचलित स्त्री-विरोधी कुप्रथा फीमेल जेनिटल म्यूटिलेशन (FGM) अर्थात् औरतों की सुन्नत के विरुद्ध स्त्रियों के संघर्ष की दर्दनाक गाथा को स्वर देती है।
यह उपन्यास उन लाखों स्त्रियों की अनकही पीड़ा का दस्तावेज़ है, जिनके शरीर और इच्छाओं पर धर्म, परम्परा और पितृसत्ता के नाम पर नियंत्रण स्थापित किया जाता है। लेखिका ने अफ्रीका, मध्य-पूर्व और अन्य समाजों की स्त्रियों के अनुभवों को मानवीय संवेदना और गहन शोध के साथ कथा में पिरोया है। यह हिंदी की उन विरल कृतियों में है, जिसने इस ज्वलंत वैश्विक मुद्दे को साहित्य के केंद्र में लाने का साहस किया।
उपन्यास यह प्रश्न उठाता है कि क्या किसी स्त्री के शरीर पर उसका अपना अधिकार नहीं है? क्या परम्परा और धर्म के नाम पर उसकी स्वतंत्रता, कामना और अस्मिता को कुचल देना उचित है? इन प्रश्नों के माध्यम से "दर्दजा" स्त्री-अधिकार, मानवाधिकार और सामाजिक न्याय के विमर्श को नई गहराई प्रदान करता है।
जयश्री राय की भाषा संवेदनशील, प्रवाहपूर्ण और भावात्मक है। वे वैचारिक बहस को सूखे तर्कों में नहीं बदलतीं, बल्कि उसे मानवीय अनुभवों और करुणा की मिट्टी से सींचती हैं। उनकी लेखनी पाठक को भीतर तक झकझोर देती है और उसे उन स्त्रियों के दर्द का सहभागी बना देती है, जिनकी आवाज़ अक्सर इतिहास और समाज के शोर में दब जाती है।
"दर्दजा केवल एक उपन्यास नहीं, बल्कि स्त्री-शरीर पर सत्ता के नियंत्रण के विरुद्ध प्रतिरोध का साहित्यिक घोषणापत्र है।"
यह कृति स्त्री-विमर्श को केवल सैद्धांतिक बहस से निकालकर जीवंत अनुभवों की दुनिया में ले आती है और बताती है कि करुणा, प्रतिरोध और साहस ही परिवर्तन की सबसे बड़ी शक्तियाँ हैं
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