"हो गई आधी रात" (मूल अंग्रेज़ी कृति: Half the Night is Gone) समकालीन भारतीय लेखक अमिताभ बागची का बहुचर्चित उपन्यास है, जिसका हिंदी अनुवाद प्रभात रंजन ने किया है। यह उपन्यास शोक, स्मृति, पितृत्व, वर्ग-व्यवस्था और भारतीय समाज के बदलते स्वरूप की गहरी पड़ताल करता है। इसे समकालीन भारतीय साहित्य की महत्वपूर्ण उपलब्धियों में गिना जाता है।
उपन्यास का केंद्रीय पात्र विश्वनाथ है, जो एक सफल हिंदी लेखक है। अपने प्रिय पुत्र की असामयिक मृत्यु के बाद वह गहरे शोक और अपराधबोध से भर जाता है। इसी मानसिक अवस्था में वह अपने एक पुराने परिचित को पत्र लिखना शुरू करता है। इन पत्रों के माध्यम से वह अपने जीवन, अपने बेटे के साथ संबंधों और भारतीय परिवार व्यवस्था को समझने का प्रयास करता है।
इसी के समानांतर एक दूसरी कथा चलती है, जिसमें उत्तर भारत के एक सम्पन्न व्यापारी परिवार, उसके नौकरों और मालिकों के जटिल संबंधों का चित्रण है। यह कथा भारतीय समाज की वर्गीय संरचना, सामंती मानसिकता, सेवा और स्वामित्व के रिश्तों तथा बदलते सामाजिक मूल्यों को उजागर करती है। दोनों कथाएँ धीरे-धीरे एक-दूसरे में गुंथती जाती हैं और जीवन, प्रेम, क्षति तथा क्षमा के गहरे प्रश्नों को सामने लाती हैं।
अमिताभ बागची ने इस उपन्यास में आधुनिक भारत और परंपरागत भारतीय जीवन-दृष्टि के बीच संवाद स्थापित किया है। कथा में रामचरितमानस, भारतीय पारिवारिक मूल्य, पितृसत्ता, धार्मिक-सांस्कृतिक स्मृतियाँ और आधुनिक शहरी जीवन की विडंबनाएँ एक साथ उपस्थित हैं। लेखक यह प्रश्न उठाते हैं कि दुःख के साथ मनुष्य कैसे जीता है और क्या स्मृतियाँ हमें मुक्ति दे सकती हैं।
साहित्यिक दृष्टि से "हो गई आधी रात" एक गहन मनोवैज्ञानिक और दार्शनिक उपन्यास है। इसकी भाषा आत्मीय, चिंतनशील और भावनात्मक है। यह केवल एक पिता के शोक की कथा नहीं, बल्कि भारतीय समाज, परिवार और मनुष्य की अपूर्णताओं का संवेदनशील आख्यान है।
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