"काँटों भरा बचपन" संवेदनशील लेखिका रजनी गोसाईं का एक मार्मिक सामाजिक उपन्यास है, जो बाल श्रम (Child Labour) की भयावह वास्तविकताओं को केंद्र में रखकर लिखा गया है। यह पुस्तक उन लाखों बच्चों की दर्दभरी कहानी है, जिनका बचपन खेल, शिक्षा और सपनों की जगह मजबूरी, शोषण और संघर्ष की भेंट चढ़ जाता है।
उपन्यास में ऐसे बच्चों की पीड़ा को स्वर दिया गया है, जिन्हें कम उम्र में ही काम करने के लिए विवश कर दिया जाता है। गरीबी, सामाजिक असमानता, पारिवारिक विवशताओं और संवेदनहीन व्यवस्था के कारण उनका बचपन काँटों भरी राहों पर चलने को मजबूर हो जाता है। लेखिका ने बाल मन की इच्छाओं, टूटते सपनों और बेहतर जीवन की आकांक्षाओं को अत्यंत संवेदनशीलता और यथार्थवादी दृष्टि से चित्रित किया है।
यह कृति केवल सहानुभूति उत्पन्न नहीं करती, बल्कि पाठकों को यह सोचने के लिए भी प्रेरित करती है कि बच्चों का बचपन सुरक्षित रखना पूरे समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है। उल्लेखनीय है कि यह रचना बाल श्रम विषयक संवेदनशील प्रस्तुति के लिए मानवाधिकार आयोग द्वारा सम्मानित भी की जा चुकी है।
"काँटों भरा बचपन" सामाजिक सरोकारों, बाल अधिकारों और यथार्थवादी साहित्य में रुचि रखने वाले पाठकों के लिए एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण और संग्रहणीय कृति है।
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