LAJJA

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  • Format: Paper Back
  • Publish Years: 2026
  • Total page: 336
  • Language: HINDI

"लज्जा" (Lajja) बांग्लादेश की प्रख्यात लेखिका, चिकित्सक और मानवाधिकार कार्यकर्ता तसलीमा नसरीन (Taslima Nasrin) का विश्वप्रसिद्ध और अत्यंत विवादास्पद सामाजिक-राजनीतिक उपन्यास है। वर्ष 1993 में प्रकाशित इस कृति ने दक्षिण एशिया के साहित्यिक और राजनीतिक जगत में तीखी बहस छेड़ दी। धार्मिक कट्टरता, अल्पसंख्यकों की असुरक्षा और मानवीय मूल्यों के क्षरण पर आधारित यह उपन्यास आज भी उतना ही प्रासंगिक माना जाता है।

उपन्यास की पृष्ठभूमि 1992 में भारत में हुई Babri Masjid demolition के बाद का Bangladesh है। इस घटना के बाद बांग्लादेश में हिंदू अल्पसंख्यकों के विरुद्ध हिंसा और भय का वातावरण बन जाता है। इसी परिवेश में उपन्यास एक हिंदू परिवार—दत्ता परिवार—की कहानी कहता है।

परिवार के मुखिया सुधामय दत्ता, उनकी पत्नी किरणमयी, पुत्र सुरंजन और पुत्री माया एक धर्मनिरपेक्ष और मानवीय समाज में विश्वास रखते हैं। सुधामय ने बांग्लादेश की स्वतंत्रता के लिए संघर्ष किया था और उन्हें भरोसा था कि उनका देश सभी नागरिकों को समान अधिकार देगा। लेकिन जैसे-जैसे सांप्रदायिक हिंसा बढ़ती है, उनका विश्वास टूटने लगता है।

सुरंजन, जो स्वयं को पहले इंसान और बाद में किसी धर्म का अनुयायी मानता था, धीरे-धीरे कटुता, भय और असुरक्षा से घिरने लगता है। दूसरी ओर, परिवार की महिलाओं पर मंडराता खतरा समाज में स्त्री और अल्पसंख्यक होने की दोहरी त्रासदी को उजागर करता है। उपन्यास यह प्रश्न उठाता है कि जब धर्म राजनीति का औजार बन जाता है, तब सबसे बड़ी कीमत आम मनुष्य को क्यों चुकानी पड़ती है।

साहित्यिक दृष्टि से

"लज्जा" केवल एक परिवार की कहानी नहीं, बल्कि धार्मिक असहिष्णुता और मानवीय विफलताओं का दस्तावेज़ है। तसलीमा नसरीन ने वास्तविक घटनाओं, समाचार रिपोर्टों और सामाजिक परिस्थितियों के आधार पर यह कथा रची है। उनकी भाषा सीधी, निर्भीक और मार्मिक है।

यह उपन्यास किसी धर्म विशेष के विरुद्ध नहीं, बल्कि कट्टरता, हिंसा और मानव-विरोधी मानसिकता के विरुद्ध एक सशक्त प्रतिरोध है। यही कारण है कि पुस्तक को व्यापक प्रशंसा के साथ-साथ तीव्र विरोध का भी सामना करना पड़ा। कई देशों में इस पर प्रतिबंध लगाए गए और लेखिका को निर्वासन का जीवन जीना पड़ा।

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