MADARIPUR JUNCTION

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  • Format: Paper Back
  • Publish Years: 2026
  • Total page: 326
  • Language: HINDI

"मदारीपुर जंक्शन" समकालीन हिंदी साहित्य के चर्चित उपन्यासकार बलेन्दु द्विवेदी का पहला और अत्यंत बहुचर्चित राजनीतिक-व्यंग्यात्मक सामाजिक उपन्यास है। वर्ष 2017 में प्रकाशित इस उपन्यास ने हिंदी साहित्य जगत में व्यापक चर्चा बटोरी और इसे हिंदी के प्रतिष्ठित व्यंग्यात्मक उपन्यासों की परंपरा में श्रीलाल शुक्ल के "राग दरबारी" के बाद की एक महत्वपूर्ण कड़ी माना गया।

उपन्यास की कथा पूर्वी उत्तर प्रदेश के एक काल्पनिक गाँव "मदारीपुर" के इर्द-गिर्द घूमती है, जो वास्तव में पूरे भारतीय ग्रामीण समाज का प्रतिनिधि रूप बनकर उभरता है। यहाँ जाति, धर्म, राजनीति, पंचायत, सत्ता, भ्रष्टाचार और सामाजिक वर्चस्व की जटिल संरचनाएँ एक-दूसरे में उलझी हुई दिखाई देती हैं।

मदारीपुर का 'पट्टी' समाज गाँव की सत्ता का केंद्र है। ऊँची जातियों का वर्चस्व, पंचायत की राजनीति, निजी स्वार्थ और सामाजिक पाखंड मिलकर ऐसी व्यवस्था निर्मित करते हैं जिसमें न्याय और समानता के लिए संघर्ष करना आसान नहीं रह जाता। दूसरी ओर, दलित और वंचित समुदाय धीरे-धीरे अपने अधिकारों के प्रति जागरूक होते हैं और यथास्थिति को चुनौती देने लगते हैं।

उपन्यास के पात्र अत्यंत जीवंत और बहुआयामी हैं। छेदी बाबू, बैरागी बाबू, चैता और मेघिया जैसे पात्र केवल व्यक्ति नहीं, बल्कि भारतीय ग्रामीण समाज की मानसिकता, संघर्ष और विरोधाभासों के प्रतीक बन जाते हैं। विशेष रूप से चैता का चरित्र सामाजिक परिवर्तन की आकांक्षा और उसके विरुद्ध खड़ी शक्तियों के संघर्ष को मार्मिक ढंग से प्रस्तुत करता है।

बलेन्दु द्विवेदी ने ग्रामीण जीवन का चित्रण किसी रोमानी दृष्टि से नहीं किया है। वे गाँव की सुंदरता के साथ-साथ उसकी क्रूर सच्चाइयों—जातिवाद, हिंसा, अवसरवाद, नैतिक पतन और सत्ता की चालबाजियों—को भी पूरी बेबाकी से सामने रखते हैं। उनकी भाषा में पूर्वांचल की मिट्टी की गंध, लोकभाषा की सहजता और तीखे व्यंग्य का अद्भुत संतुलन दिखाई देता है।

साहित्यिक दृष्टि से

"मदारीपुर जंक्शन" केवल एक गाँव की कहानी नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र के जमीनी यथार्थ का दस्तावेज़ है। यह उपन्यास पाठक को यह सोचने के लिए विवश करता है कि स्वतंत्रता और संविधान के दशकों बाद भी सामाजिक न्याय और समानता का सपना कितना अधूरा है।

इस कृति को उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान पुरस्कार से सम्मानित किया गया और बाद में इसका विभिन्न भाषाओं में अनुवाद भी हुआ। 

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Leslie Alexander
February 10, 2024 at 2:37 pm

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