"पानी पर लकीर" प्रख्यात कथाकार और साहित्य अकादेमी सम्मानित लेखिका उषाकिरण खान का एक संवेदनशील और विचारोत्तेजक उपन्यास है, जो स्त्री-अस्तित्व, आत्मपहचान और बदलते सामाजिक मूल्यों के प्रश्नों को केंद्र में रखता है। यह उपन्यास उन अदृश्य रेखाओं की कहानी है जिन्हें समाज स्त्रियों के जीवन पर खींचता है, लेकिन जिन्हें वे अपने साहस, विवेक और आत्मविश्वास से मिटाने का प्रयास करती हैं।
उपन्यास की नायिका अपने जीवन की जटिल परिस्थितियों, पारिवारिक अपेक्षाओं और सामाजिक बंधनों के बीच स्वयं की पहचान तलाशती है। वह परंपरा और आधुनिकता के द्वंद्व से गुजरते हुए यह समझने का प्रयास करती है कि स्त्री की वास्तविक स्वतंत्रता क्या है और उसका अपना अस्तित्व किन मूल्यों पर आधारित है।
उषाकिरण खान की लेखनी की सबसे बड़ी विशेषता उनकी गहरी मानवीय दृष्टि और स्त्री-मन की सूक्ष्म समझ है। वे मिथिला की सांस्कृतिक पृष्ठभूमि, लोकजीवन और सामाजिक यथार्थ को अत्यंत प्रामाणिकता के साथ प्रस्तुत करती हैं। "पानी पर लकीर" केवल एक स्त्री की कहानी नहीं, बल्कि उन तमाम महिलाओं की आवाज़ है जो अपने हिस्से की ज़मीन और पहचान की तलाश में संघर्षरत हैं।
यह उपन्यास स्त्री-विमर्श, सामाजिक परिवर्तन और मानवीय संबंधों में रुचि रखने वाले पाठकों के लिए एक महत्त्वपूर्ण कृति है। इसमें संवेदना, प्रतिरोध और आत्मविश्वास का अद्भुत संतुलन दिखाई देता है।
Your cart is empty!