"परीक्षा गुरु" हिंदी साहित्य का प्रथम मौलिक आधुनिक उपन्यास माना जाता है। इसका प्रकाशन 25 नवंबर 1882 में हुआ था और इसके रचयिता Lala Srinivas Das हैं। आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने इसे हिंदी का पहला अंग्रेज़ी ढंग का मौलिक उपन्यास माना है।
यह उपन्यास भारतीय समाज के उस संक्रमणकाल का चित्रण करता है जब अंग्रेज़ी शासन, पश्चिमी शिक्षा और नई जीवन-शैली भारतीय मध्यमवर्ग को गहराई से प्रभावित कर रही थी। लेखक ने आधुनिकता और परंपरा के बीच संतुलन स्थापित करने की आवश्यकता पर बल दिया है।
उपन्यास का मुख्य पात्र लाला मदनमोहन है, जो धन, वैभव और पश्चिमी जीवन-शैली के आकर्षण में पड़कर गलत संगति और दुर्व्यसनों का शिकार हो जाता है। उसके चाटुकार मित्र उसे पतन की ओर ले जाते हैं, जबकि उसका सच्चा मित्र ब्रजकिशोर उसे सही मार्ग दिखाता है। अनेक संकटों और जीवन-परीक्षाओं से गुजरने के बाद मदनमोहन अनुभव, विवेक और नैतिकता का महत्व समझता है।
"परीक्षा गुरु" केवल एक कथा नहीं, बल्कि तत्कालीन भारतीय समाज का दर्पण है। इसमें शिक्षा, व्यापार, नैतिकता, मित्रता, पारिवारिक जीवन, सामाजिक प्रतिष्ठा और राष्ट्रीय चेतना जैसे विषयों पर गंभीर विचार किया गया है। लेखक ने यह संदेश दिया है कि आधुनिक ज्ञान और प्रगति को अपनाते समय अपनी सांस्कृतिक जड़ों और नैतिक मूल्यों को नहीं छोड़ना चाहिए।
भाषा सरल, संवादप्रधान और बोलचाल के निकट है। उपन्यास में उपदेशात्मकता अवश्य है, परंतु यही इसकी ऐतिहासिक और साहित्यिक विशेषता भी है। हिंदी उपन्यास परंपरा के विकास को समझने के लिए यह कृति अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है।
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