"प्रत्यंचा" हिंदी के सुप्रसिद्ध कथाकार Sanjeev का एक महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक-जीवनीपरक उपन्यास है। यह उपन्यास महान समाज-सुधारक और कोल्हापुर के प्रगतिशील शासक Chhatrapati Shahuji Maharaj के जीवन, संघर्ष और सामाजिक क्रांति की गाथा प्रस्तुत करता है। लेखक ने शाहूजी महाराज के व्यक्तित्व को केवल एक राजा के रूप में नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय, समानता और मानव गरिमा के योद्धा के रूप में चित्रित किया है।
उपन्यास का शीर्षक "प्रत्यंचा" धनुष की डोरी का प्रतीक है, जो संघर्ष, संकल्प और परिवर्तन की ऊर्जा का संकेत देता है। कथा में शाहूजी महाराज के उस ऐतिहासिक संघर्ष को केंद्र में रखा गया है, जिसमें उन्होंने जातिगत भेदभाव, सामाजिक असमानता और वर्ण-व्यवस्था के विरुद्ध निर्णायक लड़ाई लड़ी। उन्होंने शिक्षा, आरक्षण, सामाजिक समानता और वंचित वर्गों के अधिकारों के लिए जो कदम उठाए, वे भारतीय सामाजिक इतिहास में मील का पत्थर माने जाते हैं।
संजीव ने इस उपन्यास में इतिहास को जीवंत कथा में रूपांतरित किया है। सत्ता के शिखर पर होते हुए भी शाहूजी महाराज को सामाजिक अपमान, विरोध और षड्यंत्रों का सामना करना पड़ा। फिर भी उन्होंने सामाजिक न्याय के अपने लक्ष्य से समझौता नहीं किया। उपन्यास इसी संघर्षशील चेतना और मानवीय साहस का दस्तावेज़ है।
साहित्यिक दृष्टि से "प्रत्यंचा" केवल एक ऐतिहासिक आख्यान नहीं, बल्कि भारतीय समाज में जाति, सत्ता, सामाजिक न्याय और लोकतांत्रिक मूल्यों पर गंभीर विमर्श प्रस्तुत करने वाली कृति है। लेखक की भाषा प्रभावशाली, शोधपरक और कथात्मक ऊर्जा से भरपूर है, जो पाठक को इतिहास के भीतर ले जाकर वर्तमान से उसका संबंध स्थापित करती है।
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