"राजा मोमो और पीली बुलबुल" चर्चित पत्रकार, लेखक और उपन्यासकार विकास कुमार झा का बहुप्रशंसित उपन्यास है, जो भारत के सबसे छोटे राज्य गोवा के बहुरंगी जीवन, उसकी सांस्कृतिक जटिलताओं और आधुनिक समाज की विडंबनाओं को केंद्र में रखता है। यह उपन्यास समकालीन हिंदी साहित्य में अपने विषय, शोध और कथात्मक विस्तार के कारण विशेष रूप से चर्चित रहा।
उपन्यास का सबसे अनूठा पक्ष यह है कि इसमें मोटापे और बढ़ते शारीरिक वजन की समस्या को केवल स्वास्थ्य संबंधी मुद्दे के रूप में नहीं, बल्कि बदलती जीवनशैली, उपभोक्तावादी संस्कृति, अकेलेपन और आधुनिक सभ्यता के संकट के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया गया है। हिंदी सहित भारतीय भाषाओं में यह अपने प्रकार की पहली ऐसी कृति मानी जाती है, जिसने इस विषय को कथा के केंद्र में स्थापित किया।
कथा का परिवेश गोवा है—समुद्र, पर्यटन, काजू के बागान, फेनी की महक, औपनिवेशिक स्मृतियाँ, स्थानीय संस्कृति और वैश्विक प्रभावों से निर्मित एक जटिल संसार। लेखक गोवा की उस भीतरी दुनिया को सामने लाते हैं जो पर्यटन-स्थल की चमकदार छवि से अलग है। यहाँ मनुष्य की इच्छाएँ, भय, प्रेम, असुरक्षाएँ और सामाजिक बदलाव एक-दूसरे से टकराते दिखाई देते हैं।
विकास कुमार झा की पत्रकारिता ने उन्हें समाज को बारीकी से देखने की दृष्टि दी है। यही कारण है कि उपन्यास में तथ्यात्मक प्रामाणिकता और साहित्यिक कल्पना का सुंदर संतुलन दिखाई देता है। गोवा का भूगोल, इतिहास, लोकजीवन और बदलती सामाजिक संरचनाएँ कथा में स्वाभाविक रूप से घुल-मिल जाती हैं।
साहित्यिक दृष्टि से "राजा मोमो और पीली बुलबुल" को शहरी आंचलिकता का एक महत्वपूर्ण प्रयोग माना गया है। जिस प्रकार फणीश्वरनाथ रेणु ने गाँवों की दुनिया को केंद्र में रखकर आंचलिक उपन्यास की परंपरा विकसित की थी, उसी प्रकार विकास कुमार झा ने गोवा के माध्यम से आधुनिक शहरी-आंचलिक जीवन का नया आख्यान रचा है। यह उपन्यास मनुष्य, शरीर, समाज और बदलती सभ्यता के संबंधों पर गंभीर प्रश्न उठाता है।
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