‘रंगभूमि’ हिंदी साहित्य के उपन्यास सम्राट Munshi Premchand की सर्वाधिक महत्वपूर्ण और व्यापक सामाजिक-राजनीतिक कृतियों में से एक है। वर्ष 1924 में प्रकाशित यह उपन्यास औपनिवेशिक भारत, सामंतवाद, पूँजीवाद, औद्योगीकरण, सामाजिक असमानता और जनसंघर्ष की महागाथा है। प्रेमचंद ने इस कृति में भारतीय समाज के विभिन्न वर्गों, धर्मों, आर्थिक शक्तियों और राजनीतिक हितों के टकराव को अत्यंत यथार्थवादी और मानवीय दृष्टि से चित्रित किया है।
उपन्यास का केंद्रीय पात्र सूरदास है—एक अंधा, निर्धन किन्तु आत्मसम्मान से परिपूर्ण व्यक्ति, जो अन्याय और शोषण के विरुद्ध संघर्ष का प्रतीक बनकर उभरता है। उसके पास अपनी पुश्तैनी भूमि है, जिस पर स्थानीय ग्रामीणों का जीवन और आजीविका निर्भर है। किंतु औद्योगिक विकास और पूँजीवादी स्वार्थों के प्रतिनिधि जॉन सेवक उस भूमि पर कारखाना स्थापित करना चाहते हैं। सूरदास अपनी भूमि और उससे जुड़े सामाजिक हितों की रक्षा के लिए संघर्ष करता है। यह संघर्ष केवल भूमि का नहीं, बल्कि मनुष्य की गरिमा, अधिकार और अस्तित्व का संघर्ष बन जाता है।
प्रेमचंद ने सूरदास के चरित्र में गांधीवादी आदर्शों—सत्य, अहिंसा, धैर्य और नैतिक प्रतिरोध—को मूर्त रूप दिया है। वह शारीरिक रूप से अंधा है, लेकिन सामाजिक और नैतिक दृष्टि से सबसे अधिक जागरूक पात्र है। उसके माध्यम से लेखक यह दिखाते हैं कि वास्तविक शक्ति धन, पद या सत्ता में नहीं, बल्कि सत्य और नैतिक साहस में निहित होती है।
‘रंगभूमि’ की कथा केवल सूरदास तक सीमित नहीं है। इसमें सोफिया, विनय, रानी जाह्नवी, जॉन सेवक, राजा महेंद्र कुमार और अनेक अन्य पात्रों के माध्यम से भारतीय समाज का बहुआयामी चित्र प्रस्तुत किया गया है। प्रेम, धर्म, राजनीति, जाति, वर्ग और सत्ता के जटिल संबंध कथा को व्यापक सामाजिक परिप्रेक्ष्य प्रदान करते हैं। उपन्यास में विभिन्न धार्मिक समुदायों और सामाजिक वर्गों के बीच उत्पन्न तनावों तथा मानवीय संबंधों की जटिलताओं का भी गहन चित्रण मिलता है।
इस उपन्यास की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि प्रेमचंद ने औद्योगीकरण और पूँजीवादी विकास के प्रश्न को अत्यंत संवेदनशीलता के साथ उठाया है। वे विकास का विरोध नहीं करते, लेकिन उस विकास पर प्रश्नचिह्न लगाते हैं जो गरीबों, किसानों और श्रमिकों को विस्थापित करके आगे बढ़ता है। ‘रंगभूमि’ में ग्रामीण भारत और उभरती औद्योगिक शक्तियों के बीच का संघर्ष भारतीय आधुनिकता की एक गंभीर आलोचना के रूप में सामने आता है।
प्रेमचंद की भाषा सरल, प्रभावशाली और जीवन के निकट है। वे समाज के छोटे से छोटे व्यक्ति को भी साहित्य का केंद्र बना देते हैं। ‘रंगभूमि’ में उनका यथार्थवाद, मानवीय करुणा और सामाजिक चेतना अपने उत्कर्ष पर दिखाई देती है। यह उपन्यास केवल एक व्यक्ति की कहानी नहीं, बल्कि उस समूचे समाज की कथा है जो अन्याय, शोषण और सत्ता के विरुद्ध अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है।
‘रंगभूमि’ हिंदी साहित्य की एक कालजयी कृति है, जो आज भी भूमि-अधिग्रहण, औद्योगिक विकास, सामाजिक न्याय, जनाधिकार और मानवीय गरिमा जैसे प्रश्नों पर उतनी ही प्रासंगिक प्रतीत होती है जितनी अपने प्रकाशन काल में थी। यह उपन्यास भारतीय समाज के अंतर्विरोधों और संघर्षों को समझने के लिए एक अनिवार्य साहित्यिक दस्तावेज़ है।
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