"समय अश्व बेलगाम" हिंदी की वरिष्ठ और प्रतिष्ठित कथाकार चन्द्रकांता का अत्यंत महत्वपूर्ण सामाजिक-राजनीतिक उपन्यास है। यह उपन्यास कश्मीरी पंडितों के विस्थापन, सांस्कृतिक जड़ों से कट जाने की त्रासदी और वैश्वीकरण के दौर में बदलती मानवीय संवेदनाओं का गहरा और मार्मिक आख्यान प्रस्तुत करता है।
उपन्यास का केंद्र एक ऐसा कश्मीरी पंडित परिवार है, जिसे आतंक और असुरक्षा के कारण अपनी जन्मभूमि छोड़कर दिल्ली जैसे महानगर में शरण लेनी पड़ती है। अपने घर, स्मृतियों, पड़ोस, भाषा और सांस्कृतिक परिवेश से अचानक विच्छिन्न हो जाना केवल भौगोलिक विस्थापन नहीं, बल्कि पहचान के संकट में बदल जाता है। लेखक ने इस पीड़ा को अत्यंत संवेदनशीलता से अभिव्यक्त किया है।
चन्द्रकांता यह भी दिखाती हैं कि विस्थापन केवल कश्मीर की त्रासदी नहीं है। वैश्वीकरण के इस दौर में लोग कभी परिस्थितियों से मजबूर होकर, तो कभी बेहतर अवसरों की तलाश में अपनी जड़ों से उखड़ते जा रहे हैं। जीवन एक निरंतर प्रतिस्पर्धा में बदल गया है, जहाँ सफलता की दौड़ में मनुष्य अपनी स्मृतियों, रिश्तों और सांस्कृतिक अस्मिता से दूर होता जाता है।
उपन्यास में कश्मीर केवल एक भौगोलिक प्रदेश नहीं, बल्कि स्मृति, संस्कृति और सह-अस्तित्व का प्रतीक है। दिल्ली में नया जीवन शुरू करने वाले पात्र अपने भीतर अतीत की उजली और भयावह दोनों स्मृतियाँ लिए चलते हैं। नई ज़मीन पर वे जीवन को फिर से गढ़ने का प्रयास करते हैं, लेकिन खोई हुई पहचान का दर्द उनका पीछा नहीं छोड़ता।
साहित्यिक दृष्टि से "समय अश्व बेलगाम" विस्थापन, वैश्वीकरण और सांस्कृतिक अस्मिता के प्रश्नों पर लिखा गया समकालीन हिंदी का एक महत्वपूर्ण उपन्यास है। चन्द्रकांता की भाषा संवेदनशील, प्रवाहपूर्ण और गहन मानवीय करुणा से संपन्न है। यह कृति पाठक को यह सोचने के लिए विवश करती है कि बदलते समय में मनुष्य की वास्तविक पहचान क्या है—उसकी सफलता, उसका वर्तमान या उसकी स्मृतियाँ?
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