"शहर से दस किलोमीटर" समकालीन हिंदी की महत्वपूर्ण कवयित्री और कथाकार नीलेश रघुवंशी का चर्चित उपन्यास है। यह कृति शहर और गाँव के बीच फैली उस अदृश्य दुनिया का आख्यान है, जो न पूरी तरह गाँव है और न ही शहर। यह उन लोगों की कहानी है जो विकास, विस्थापन और बदलती सामाजिक संरचनाओं के बीच अपनी पहचान और अस्तित्व को बचाए रखने का संघर्ष कर रहे हैं।
उपन्यास का परिवेश भोपाल और उसके आसपास का वह भूगोल है, जो शहर से महज़ दस किलोमीटर दूर है। लेखक दिखाती हैं कि शहर के ठीक बाहर एक ऐसी दुनिया बसती है जो महानगरीय कल्पनाओं और सपनों का हिस्सा नहीं है। वहाँ खेत हैं, पठार हैं, बंजर और उपजाऊ ज़मीनें हैं; वहाँ मेहनतकश लोग हैं, उनके पशु हैं, रिश्ते हैं, प्रेम है, झगड़े हैं और जीवन को बचाए रखने की जिद है।
इस उपन्यास की एक विशिष्ट विशेषता "साइकिल" का रूपक है। कथा एक स्त्री की साइकिल के साथ आगे बढ़ती है, जो शहर की व्यस्त सड़कों से निकलकर उन इलाक़ों तक पहुँचती है जहाँ शहर की सीमाएँ गाँवों में घुलने लगती हैं। यह साइकिल केवल यातायात का साधन नहीं, बल्कि बदलते समाज की साक्षी है, जो शहर के हाशिए पर बसे लोगों के दुख, श्रम, संघर्ष और सपनों को दर्ज करती चलती है।
नीलेश रघुवंशी ने शहरी विस्तार, ग्रामीण विस्थापन, स्त्री-अनुभव, श्रमशील जीवन और विकास की विडंबनाओं को अत्यंत संवेदनशीलता के साथ चित्रित किया है। यह उपन्यास उन लोगों की आवाज़ बनता है जो शहरों का निर्माण तो करते हैं, लेकिन स्वयं शहर के नागरिक नहीं बन पाते। उनके जीवन की असुरक्षाएँ, आकांक्षाएँ और टूटते-बनते रिश्ते कथा को गहरी मानवीय ऊष्मा प्रदान करते हैं।
साहित्यिक दृष्टि से "शहर से दस किलोमीटर" समकालीन हिंदी उपन्यास की एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है। यह शहरीकरण की प्रक्रिया का मानवीय दस्तावेज़ है, जो विकास के चमकदार आख्यानों के पीछे छूटती हुई दुनिया को पाठक के सामने लाता है। इसमें स्त्री-दृष्टि, सामाजिक यथार्थ और आंचलिक संवेदना का सुंदर समन्वय दिखाई देता है।
Neque porro est qui dolorem ipsum quia quaed inventor veritatis et quasi
architecto var sed efficitur turpis gilla sed sit amet finibus eros. Lorem
Ipsum is
simply dummy
Your cart is empty!