"शर्मिष्ठा" समकालीन हिंदी लेखिका अणुशक्ति सिंह का चर्चित पौराणिक-स्त्रीवादी उपन्यास है, जिसमें महाभारत-पूर्व की एक उपेक्षित किंतु अत्यंत महत्वपूर्ण स्त्री-पात्र शर्मिष्ठा को केंद्र में रखकर उसकी जीवन-गाथा को नए दृष्टिकोण से प्रस्तुत किया गया है। यह उपन्यास इतिहास और मिथक के बीच छूट गई उस स्त्री की आवाज़ को सामने लाता है, जो सदियों तक केवल दूसरे पात्रों की कथा का हिस्सा बनकर रह गई थी।
शर्मिष्ठा, असुर सम्राट वृषपर्वा की पुत्री थीं। वे रूपवान, बुद्धिमती और स्वाभिमानी थीं। उनका बचपन देवयानी (शुक्राचार्य की पुत्री) और कच के साथ बीता। मित्रता के बावजूद देवयानी और शर्मिष्ठा के बीच प्रतिस्पर्धा का भाव भी था। परिस्थितियाँ ऐसी बनीं कि देवयानी के क्रोध और स्वार्थ के कारण राजकुमारी शर्मिष्ठा को उसकी दासी बनकर रहना पड़ा।
इसके बाद कथा में राजा ययाति का प्रवेश होता है। शर्मिष्ठा और ययाति के बीच प्रेम जन्म लेता है, लेकिन यह प्रेम सामाजिक स्वीकृति और सम्मान नहीं प्राप्त कर पाता। शर्मिष्ठा को अपने पुत्र पुरु के भविष्य और अपने वंश की रक्षा के लिए अनेक त्याग करने पड़ते हैं। वह अपमान, प्रेम, मातृत्व और संघर्ष के बीच अपनी अस्मिता को बचाए रखने का प्रयास करती है।
लेखिका अणुशक्ति सिंह ने शर्मिष्ठा को केवल पौराणिक पात्र के रूप में नहीं, बल्कि एक ऐसी स्त्री के रूप में चित्रित किया है जो परिस्थितियों के आगे टूटती नहीं, बल्कि अपने निर्णय स्वयं लेने का साहस रखती है। यह उपन्यास स्त्री की स्वतंत्रता, आत्मसम्मान और उसकी अदृश्य शक्ति को रेखांकित करता है।
"शर्मिष्ठा" एक महत्त्वपूर्ण मिथकीय पुनर्पाठ (Mythological Retelling) है। यह उपन्यास उन स्त्रियों की कथा कहता है जिन्हें इतिहास ने हाशिए पर रखा। इसकी भाषा प्रवाहपूर्ण, भावनात्मक और काव्यात्मक है। लेखिका ने पौराणिक घटनाओं को आधुनिक संवेदनशीलता के साथ प्रस्तुत करते हुए स्त्री-विमर्श को एक नया आयाम दिया है।
यह कृति उन पाठकों के लिए विशेष रूप से पठनीय है जो महाभारत-पूर्व कथाओं, पौराणिक पुनर्कथन और स्त्री-केंद्रित साहित्य में रुचि रखते हैं।
Neque porro est qui dolorem ipsum quia quaed inventor veritatis et quasi
architecto var sed efficitur turpis gilla sed sit amet finibus eros. Lorem
Ipsum is
simply dummy
Your cart is empty!