"तमस" हिंदी साहित्य के महान कथाकार Bhisham Sahni का कालजयी उपन्यास है, जिसे भारत-विभाजन पर लिखी गई सबसे महत्वपूर्ण साहित्यिक कृतियों में गिना जाता है। यह उपन्यास 1947 के विभाजन के दौरान भड़की सांप्रदायिक हिंसा, मानवीय त्रासदी और सामाजिक विघटन का अत्यंत मार्मिक एवं यथार्थवादी चित्रण प्रस्तुत करता है। उपन्यास को 1975 में साहित्य अकादेमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।
उपन्यास की कथा एक छोटे से कस्बे से आरंभ होती है, जहाँ नाथू नामक एक गरीब सफाईकर्मी को छलपूर्वक एक सूअर मारने के लिए कहा जाता है। बाद में उसी सूअर का शव मस्जिद के बाहर फेंक दिया जाता है, जिससे सांप्रदायिक तनाव भड़क उठता है और देखते ही देखते पूरा क्षेत्र हिंसा, भय और अविश्वास की आग में जलने लगता है।
"तमस" केवल दंगों की कहानी नहीं है, बल्कि उन राजनीतिक, सामाजिक और मनोवैज्ञानिक शक्तियों का विश्लेषण भी है जो मनुष्य को मनुष्य के विरुद्ध खड़ा कर देती हैं। भीष्म साहनी ने हिंदू, मुस्लिम, सिख और अंग्रेज़ अधिकारियों सहित विभिन्न समुदायों के पात्रों के माध्यम से विभाजन की जटिलता और उसके विनाशकारी प्रभावों को अत्यंत संतुलित दृष्टि से प्रस्तुत किया है।
इस उपन्यास की सबसे बड़ी विशेषता इसकी मानवीय संवेदना है। लेखक किसी एक समुदाय को दोषी ठहराने के बजाय यह दिखाते हैं कि सांप्रदायिक राजनीति और सत्ता के खेल में सबसे अधिक पीड़ा आम लोगों को झेलनी पड़ती है। विस्थापन, भय, हत्या, अविश्वास और टूटते हुए मानवीय रिश्तों का चित्रण पाठक को भीतर तक झकझोर देता है।
साहित्यिक दृष्टि से "तमस" हिंदी के सर्वश्रेष्ठ यथार्थवादी उपन्यासों में से एक है। इसकी भाषा सरल, प्रभावशाली और दस्तावेज़ीय प्रामाणिकता से युक्त है। विभाजन की विभीषिका को समझने के लिए यह कृति आज भी उतनी ही प्रासंगिक है जितनी अपने प्रकाशन के समय थी।
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