"उन्नीसवीं बारिश" समकालीन हिंदी की चर्चित कथाकार शर्मिला जालान का अत्यंत संवेदनशील और कलात्मक मनोवैज्ञानिक-सामाजिक उपन्यास है। यह उपन्यास प्रेम, स्मृति, अकेलेपन, पारिवारिक संबंधों और मनुष्य के भीतर लगातार चलने वाली भावनात्मक बारिश की कथा है। इसकी सबसे बड़ी विशेषता इसकी काव्यात्मक भाषा और आत्मान्वेषी शिल्प है, जिसके कारण इसे पढ़ते हुए पाठक को ऐसा अनुभव होता है मानो वह कविता और उपन्यास की सीमा-रेखा पर खड़ा हो।
उपन्यास का केंद्र एक युवती का आंतरिक संसार है। उसके जीवन में घटित रिश्ते, स्मृतियाँ, इच्छाएँ, हानि, प्रेम और आत्मसंघर्ष धीरे-धीरे खुलते हैं। यह कोई घटनाओं से भरा हुआ तेज़ रफ्तार उपन्यास नहीं है, बल्कि मनुष्य के भीतर घटित होने वाली सूक्ष्म हलचलों का दस्तावेज़ है। यहाँ बाहरी दुनिया से अधिक महत्व उन अनुभूतियों का है, जिन्हें शब्दों में व्यक्त करना आसान नहीं होता।
"उन्नीसवीं बारिश" का शीर्षक भी प्रतीकात्मक है। बारिश यहाँ केवल मौसम नहीं, बल्कि स्मृति, प्रतीक्षा, प्रेम, शुद्धि और पुनर्जन्म का बिंब बनकर आती है। जीवन की हर "बारिश" मनुष्य को बदलती है, लेकिन उन्नीसवीं बारिश शायद वह क्षण है जब व्यक्ति स्वयं को नए ढंग से पहचानना शुरू करता है।
शर्मिला जालान की लेखन-शैली अत्यंत कलात्मक है। वे पात्रों के मनोभावों को व्यक्त करने के लिए कई बार कविता, उद्धरण और साहित्यिक संकेतों का सहारा लेती हैं। उपन्यास में अनेक स्थानों पर शीर्ष कवियों की पंक्तियाँ पात्रों की मानसिक अवस्थाओं को उभारने का माध्यम बनती हैं। इसीलिए आलोचकों ने इसे "कविता में उपन्यास" और "उपन्यास में कविता" तक कहा है।
यह कृति आधुनिक शहरी मध्यवर्गीय जीवन की उन चुप्पियों को भी दर्ज करती है, जिनमें लोग बाहर से सामान्य दिखाई देते हैं, लेकिन भीतर अनेक अधूरी इच्छाओं, प्रश्नों और स्मृतियों को ढोते रहते हैं।
"उन्नीसवीं बारिश" समकालीन हिंदी कथा-साहित्य की एक विशिष्ट उपलब्धि है। यह उपन्यास पाठक से धैर्य और संवेदनशीलता की माँग करता है। जो पाठक मनोवैज्ञानिक गहराई, काव्यात्मक गद्य और आत्मविश्लेषी कथाओं का आनंद लेते हैं, उनके लिए यह पुस्तक एक विशेष अनुभव सिद्ध होती है।
यह केवल एक स्त्री की कहानी नहीं, बल्कि प्रेम, स्मृति, समय और आत्म-पहचान की सार्वभौमिक मानवीय यात्रा की कथा है।
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