"उर्मिला" वरिष्ठ कथाकार Asha Prabhat का एक महत्त्वपूर्ण पौराणिक-नारीवादी उपन्यास है, जिसमें रामकथा के अपेक्षाकृत उपेक्षित पात्र उर्मिला के जीवन, त्याग, प्रेम, धैर्य और आंतरिक संघर्ष को केंद्र में रखा गया है। यह उपन्यास रामायण की कथा को एक नए दृष्टिकोण से देखते हुए उस स्त्री की आवाज़ को सामने लाता है, जो इतिहास और लोकस्मृति में अक्सर हाशिए पर रही है।
रामकथा में जहाँ राम, सीता और लक्ष्मण के वनगमन का विस्तृत वर्णन मिलता है, वहीं लक्ष्मण की पत्नी उर्मिला के जीवन और मनःस्थिति पर अपेक्षाकृत कम प्रकाश डाला गया है। आशा प्रभात का यह उपन्यास इसी रिक्ति को भरने का प्रयास करता है। लेखिका यह प्रश्न उठाती हैं कि चौदह वर्षों तक अपने पति के वियोग को सहते हुए उर्मिला ने किस प्रकार अपने कर्तव्यों का निर्वाह किया होगा और अयोध्या के राजमहल में रहकर उन्होंने किन मानसिक, भावनात्मक और सामाजिक चुनौतियों का सामना किया होगा।
उपन्यास में उर्मिला केवल त्याग की प्रतिमूर्ति नहीं, बल्कि संवेदनशील, विचारशील और आत्मसम्मान से सम्पन्न स्त्री के रूप में उभरती हैं। उनके माध्यम से प्रेम, प्रतीक्षा, कर्तव्य, स्त्री-अस्तित्व और आत्मबल जैसे विषयों की गहन पड़ताल की गई है। लेखिका ने पौराणिक कथा को आधुनिक संवेदना और स्त्री-विमर्श के दृष्टिकोण से पुनर्परिभाषित किया है।
भाषा सहज, भावपूर्ण और प्रवाहमयी है। कथा में पौराणिक वातावरण के साथ-साथ मानवीय मनोविज्ञान का सूक्ष्म चित्रण मिलता है। इस कारण यह उपन्यास केवल धार्मिक या पौराणिक आख्यान न रहकर स्त्री-अनुभव की एक सशक्त साहित्यिक अभिव्यक्ति बन जाता है।
"उर्मिला" उन पाठकों के लिए विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण है जो रामायण के अल्पचर्चित पात्रों, स्त्री-विमर्श, पौराणिक पुनर्पाठ और समकालीन हिंदी उपन्यासों में रुचि रखते हैं।
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